सहकार से समृद्धि : छत्तीसगढ़ की एक सफलता गाथा
छत्तीसगढ़ राज्य ने सहकारिता के माध्यम से औद्योगिक और ग्रामीण समृद्धि का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है। किसानों की भागीदारी से स्थापित सहकारी शक्कर कारखानों ने न केवल गन्ना उत्पादक किसानों को आर्थिक सशक्तिकरण दिया, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग, रोजगार और ऊर्जा उत्पादन के नए अवसर भी सृजित किए।
राज्य का पहला भोरमदेव सहकारी शक्कर कारखाना (कवर्धा) वर्ष 2002-03 में स्थापित हुआ, जिसने अपने विकास की यात्रा में क्षमता वृद्धि करते हुए 3500 टीसीडी तक विस्तार किया। इसके साथ ही 12 मेगावाट के को-जनरेशन संयंत्र द्वारा विद्युत उत्पादन से यह आत्मनिर्भर बना। इसी प्रकार दंतेश्वरी मैया (बालोद), माँ महामाया (अम्बिकापुर) और सरदार वल्लभभाई पटेल सहकारी कारखाना (पण्डरिया) ने भी अपनी क्षमता, उत्पादन और तकनीकी नवाचार से राज्य की शक्कर उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
इन कारखानों ने लगभग 57537 अंशधारी व्यक्तिगत किसानों को सदस्य बनाकर सीधे लाभ पहुंचाया है। वर्ष 2023-24 में ही लगभग 43000 हेक्टेयर से अधिक गन्ना क्षेत्राच्छादन और 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक गन्ना पेराई का लक्ष्य इस सामूहिक प्रयास की सफलता को दर्शाता है।
राज्य ने आगे बढ़ते हुए ईथेनॉल उत्पादन में भी कदम रखा है। भोरमदेव में 80 KLPD क्षमता का ईथेनॉल संयंत्र तथा कोण्डागांव में मक्का आधारित प्लांट की स्थापना से न केवल जैव-ईंधन उत्पादन को प्रोत्साहन मिला है, बल्कि किसानों की फसलों का मूल्यवर्धन भी संभव हुआ है।
सहकारी शक्कर एवं ईथेनॉल उद्योगों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है—जहाँ किसान केवल उत्पादक नहीं, बल्कि उद्योग के साझेदार बने हैं। यह "सहकार से समृद्धि" की वह जीवंत मिसाल है, जिसने आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ की नींव को सशक्त बनाया है।